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मनप्रीत बादल ने जीएसटी काउंसिल से कहा कि वह भारत सरकार और राज्यों के बीच विवादों के समाधान के लिए सही तरीके से एक तंत्र स्थापित करे

चंडीगढ़ (पीतांबर शर्मा) :  पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने सोमवार को भारत सरकार और एक या एक से अधिक राज्यों के बीच या भारत सरकार और एक तरफ किसी भी राज्य या राज्यों और दूसरी तरफ एक या एक से अधिक राज्यों के बीच किसी भी विवाद को सुलझाने के लिए सही तरीके से एक तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। यह माँग जीएसटी परिषद् की सिफारिशों से लागू करने के लिया कहा गया है।
विशेष रूप से, विवाद निपटान तंत्र को सक्रिय करने के पहलू पर-जो संबंधित राज्यों को एक स्वतंत्र निकाय के समक्ष फिर से मौन रहने से पहले अपने मुद्दे को आंदोलन करने की अनुमति दे सकता है। मनप्रीत बादल ने उल्लेख किया कि पहले एक विचार व्यक्त किया गया था कि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है और इसे जीएसटी विधेयक पर गठित संसदीय स्थायी समिति ने खारिज़ कर दिया। मनप्रीत बादल ने आशंकाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि यह सही स्थिति नहीं थी क्योंकि स्थायी समिति ने स्पष्ट रूप से पूर्वोक्त सिफारिश की थी, जिसे अब हमारे संविधान में अनुच्छेद 279 ए (11) के रूप में शामिल किया गया है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जीएसटी परिषद् की 42वीं बैठक में जीएसटी मुआवज़े पर हस्तक्षेप करते हुए, मनप्रीत बादल ने कहा कि मौजूदा स्थिति उक्त खंड द्वारा पूरी तरह से कवर की गई है, हालांकि वह चाहते हैं कि इस मुद्दे को इस तंत्र के बाहर हल किया जा सकता था। वित्त मंत्री ने कहा, ‘‘हम इस प्रकार कुछ खतरनाक मिसालें स्थापित करने के करीब हैं: संविधान को अलविदा। मुआवज़ा कानून को अलविदा। परिषद् की बैठक द्वारा सुझाए गए बिंदुओं को अलविदा। अटॉर्नी जनरल (एजी) की राय को अलविदा।’’
परिषद् के चेयरपर्सन और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन को अवगत कराते हुए, मनप्रीत बादल ने कहा, ‘‘हमारे शेयरधारकों पर बड़ी जिम्मेदारी है, विशेष रूप से तुम्हारे। हम वन-नेशन-वन-टैक्स की धारणा को अपूरणीय क्षति पहुंचाने के करीब हैं जो कानून की आत्मा है।’’ बादल ने कहा कि यह इस समझ के साथ था कि उन्होंने इस विषय पर एक मंत्री समूह को सुझाव दिया था और सुनिश्चित करें कि समूह सभी मुद्दों पर शांति से और सभी की भावना को देखने में सक्षम होगा। वित्त मंत्री ने आगे कहा कि यह विवाद निपटान तंत्र के लिए सभ्य प्रॉक्सी के रूप में भी काम करेगा यदि समूह की घोषणा आज की जा सकती है तो यह अगले 48 घंटों में अपनी रिपोर्ट दे सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई काउंसिल जल्दबाज़ी की बजाय कानूनी राह अपनाएगी।
बादल ने हमदर्दी से कहा कि पंजाब ने पिछले सत्र में भी और लिखित रूप में भी कई महत्त्वपूर्ण सवाल उठाए थे और वह अभी भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं। अब तक कोई जवाब नहीं आया है, इसलिए वह यह मान चूके हैं कि शायद कोई जवाब आयेगा ही नहीं और हम उन सवालों के जवाब के बिना आगे बढऩा चाहते हैं।
मनप्रीत बादल ने आगे कहा कि देश और नागरिकों के लिए अच्छा और बुरा समय आता रहता है और बीत जाता है और कानून मुख्य रूप से सही व्यवहार को यकीनी बनाने के लिए ही बने होते हैं, ताकि कोई हमे लालच देकर उचित रास्ते से भटका न सके। मनप्रीत बादल ने जोर देकर कहा कि जहां तक पंजाब का सवाल है, हम मुद्दे साधारण हैं।  हमें कानून के अनुसार मुआवजा दे दीजिए। यदि व्यवहारिक बदलाव जरूरी है तो कानून में संशोधन कीजिए। उन्होंने यह भी कहा कि कानून और मुआवजे में शुरू से ही कोई भी भौतिक परिवर्तन नहीं हुआ है और सभी बदलाव अब सर्कूलर और कार्यकारी आदेशों के रूप में आए हैं यहां तक कि आज की तारीख में उनमें काऊंसिल की सिफारिश की ताकत भी नहीं है।
मनप्रीत बादल ने सभी के लाभ के लिए बताया कि जो बदला जा रहा है, उसका कानून में कोई जिक्र नहीं है। कानून में वर्णित ‘मुआवजा’ शब्द का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह अनुमानित राजस्व और वास्तविक राजस्व के बीच फर्क है, जिसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसलिए मुआवज़े को मनमाने ढंग से दो हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता है और 7 प्रतिशत की वृद्धि को लागू करने के लिए कोई कानूनी आधार नहीं है जोकि पहले 10 प्रतिशत थी।
उन्होंने आगे खुलासा किया कि धारा 10 में वर्णित फंड से मुआवजा शब्द लिया गया है। इस धारा के बाहर से जो भी फंड है वह ‘मुआवजा’ नहीं है, इसलिए जब तक कि केंद्र सरकार उधार नहीं लेती और इसे मुआवजा फंड में जमा नहीं करती, यह मुआवजा नहीं है। मनप्रीत बादल ने आगे बताया किया कि धारा 7 के तहत आवश्यक है कि मुआवजे का भुगतान ट्रांजिशन समय  यानी पाँच साल के भीतर किया जाए, जिसे एजी के विचार में भी स्पष्ट किया गया है, जिन्होंने आगे कहा है कि जब तक सभी राज्य सहमत नहीं होते, मुआवजे को पाँच साल से अधिक समय तक देरी नहीं की जा सकती। इस प्रकार अधिकांश वोट होने का कोई सवाल ही नहीं है। एजी के अनुसार सभी राज्यों को सहमत होना चाहिए, जो स्पष्ट रूप से इस मुद्दे में नहीं है।

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