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मोदी सरकार का करोड़ों का पैकेज आर्थिक बदहाली क्यों नहीं रोक पाया

दिल्ली: (ब्यूरो) कोरोना महामारी से अर्थव्यवस्था पर होने वाले असर को देखते हुए मई महीने में सरकार ने 20 लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान किया था. पाँच चरणों में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पैकेज का पूरा विवरण देश के सामने रखा था.

पैकेज में 5.94 लाख करोड़ रुपए की रकम मुख्य तौर पर छोटे व्यवसायों को क़र्ज़ देने और ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों और बिजली वितरण कंपनियों की मदद के नाम पर आबंटित करने की घोषणा की गई थी.

3.10 लाख करोड़ रुपए प्रवासी मज़दूरों को दो महीने तक मुफ़्त में अनाज देने और किसानों को क़र्ज़ देने में इस्तेमाल के लिए और 1.5 लाख करोड़ रुपए खेती के बुनियादी ढाँचे को ठीक करने और कृषि से जुड़े संबंधित क्षेत्रों पर ख़र्च करने की बात कही थी.

इसके अलावा कोयला क्षेत्र, खनन, विमानन, अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर शिक्षा, रोज़गार, व्यवसायों की मदद और सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों के लिए सुधार की बात कही गई थी.

पैकेज के ऐलान को तीन महीने हो चुके हैं, अधिकतर जगहों पर बाज़ार खुल गए है, आर्थिक गतिविधियाँ चालू हो रही हैं, लेकिन कोरोना को लेकर अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है और अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब है, इसे संभालने के लिए लोग सरकार से उम्मीद लगाए बैठे हैं.

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी यानी सीएमआई के आँकड़ों के मुताबिक़ 23 अगस्त को ख़त्म हुए हफ़्ते में बेरोज़गारी दर 7.46 प्रतिशत थी. शहरी इलाक़ों में ये दर 9.98 प्रतिशत और ग्रामीण इलाक़ों में 6.32 प्रतिशत दर्ज की गई.

आर्थिक मामलों के जानकार आलोक जोशी बताते हैं, “अप्रैल महीने में क़रीब 15 करोड़ लोग बेरोज़गार हो गए थे, इनमें से 12 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र के थे. इनमें से 11 करोड़ लोगों को अब रोज़गार मिल गया है. ये वो लोग थे जो कोई भी काम कर सकते हैं. शहर से गाँव गए, तो वहाँ मनरेगा का काम मिल गया है, इन्हें कुछ काम मिल गया है, यानी सरकार ने जो रोज़गार के लिए पैसे दिए, वो इनके पास पहुँचे और इनका फ़ायदा हो गया.”

इसके अलावा कोरोना के दौरान कृषि क्षेत्र में उत्पादन में कमी नहीं आई, इसलिए असंगठित क्षेत्र के लोग जो वापस भी लौट गए, उन्हें खाने-पीने की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा.

लेकिन मिडिल क्लास और सैलरी वाले लोगों की परेशानियाँ बढ़ गईं, सैलरी पर गुज़ारा करने वाले क़रीब एक करोड़ लोग बेरोज़गार हैं. आलोक जोशी के मुताबिक, “इन्हें जॉब मिलना मुश्किल है, इस कारण से गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है, हालात के और ख़राब होने के आसार दिख रहे हैं.”

इसके अलावा रेस्तराँ और मॉल में दुकान चलाने वाले या उनमें काम करने वाले लोगों को भी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है. बड़ी कंपनियाँ भी लोगों को निकाल रही हैं. म्यूचल फ़ंड, शेयर मार्केट, इंटरेस्ट रेट में भी लोगों को नुक़सान हुआ है, कई लोग पहले से कम सैलरी में काम कर रहे हैं.

यह एक कारण है कि दुकानें और फ़ैक्टरियों के खुलने के बाद भी डिमांड की कमी है.

जानकार मानते हैं कि सरकार ने छोटे और मँझले उद्योगों को लोन देकर काम शुरू करवाने में मदद की, कॉरपोरेट टैक्स में भी छूट दी गई. इन सबका फ़ायदा उत्पादन में तो हुआ, लेकिन लोगों के पास पैसे नहीं होने के कारण डिमांड नहीं बढ़ी.

आर्थिक मामलों के जानकार आलम श्रीनिवास ने बीबीसी को बताया, “सरकार ये सोच रही है कि प्रोडक्शन शुरू होगा, लोगों के बीच में डिमांड है, लोग ख़रीदना चाहते हैं और बाहर जाना चाहते हैं. लेकिन अगर उपभोक्ता के हाथ में पैसा ही नहीं है, तो इनका कोई मतलब नहीं बनता.”

वो लोग, जिन्हें इस दौरान पहले की तरह पैसे मिलते रहे हैं, वो भी भविष्य को लेकर असमंजस में है, इसलिए पैसे ख़र्च करने की प्रवृत्ति में कमी आई है, बाज़ार में डिमांड तभी बढ़ेगी जब लोगों के अंदर भरोसा हो.

श्रीनिवास कहते हैं, “लोगों के हाथ में पैसे पहुँचाने का सबसे आसान तरीक़ा है, टैक्स में कटौती करना , सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स कम किया तो वो उपभोक्ता के लिए भी टैक्स घटा सकती थी.”

सरकार ने लॉकडाउन के समय लोन पर मोरेटोरियम की सुविधा दी थी, इस प्रावधान से लोगों को छह महीनों के लिए लोन भुगतान को टालने का विकल्प मिला था. लेकिन इस कारण मासिक किस्तों की संख्या बढ़ गई, ब्याज के भुगतान पर कोई छूट नहीं दी गई थी.

आर्थिक मामलों के जानकार आलोक जोशी मानते है कि लॉकडाउन का बैंकों पर क्या असर पड़ा है, ये आने वाले कुछ समय में स्पष्ट होगा. वो कहते हैं, “अभी तो सरकार ने ब्याज पर छूट दे रखी है, बैंको को भी नहीं पता कि जब ये छूट हटेगी तब क्या होगा, कितने लोग हैं जो दे पैसे दे पाएँगे.”

जानकार मानते हैं कि लोगों के हाथ में पैसा पहुँचाना ज़रूरी है और इसके लिए सरकार को क़दम उठाने चाहिए. आलोक जोशी कहते हैं कि हो सकता सरकार सही समय का इंतज़ार कर रही है.

उनके मुताबिक इकॉनॉमी को वापस लाने के लिए सरकार को ख़र्च करना पड़ेगा, कंस्ट्रक्शन जैसी चीज़ों पर ज़ोर देना होगा. वो कहते हैं, “ऐसा लगता है सरकार अभी फँसी हुई है, वो एक और पुश दे सकती है लेकिन तब जब बीमारी का असर कम होगा, अगर ऐसे समय में पैसे लगाए जाएँ, जब हालात सुधरने की आशंका कम है तो बहुत ज़्यादा फ़ायदा नहीं होगा.”

लेकिन क्या सरकार इस स्थिति में है कि वो कोई पैकेज का ऐलान कर सके?

जानकार आलम श्रीनिवास का मानना है कि सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं. वो कहते हैं, “सरकार कह चुकी है कि उसके पास आय की कमी है, मुझे लगता है वो जितना दे सकते थे, पिछले पैकेज में दे चुके हैं.”

श्रीनिवास के मुताबिक़ सरकार ने जिन सुधारों की बात की है, उन्हें ज़मीन पर उतरने में बहुत समय लगेगा, फ़िलहाल ज़रूरत है कि सरकार जल्द कुछ क़दम उठाए, उनके मुताबिक़ सरकार के लिए अब रिस्क लेना बहुत ज़रूरी हो गया है.

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