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कांग्रेस में कलह शरू अब तक गांधी ही रहे हैं विद्रोह के केंद्र; पहली बार उनके खिलाफ दिख रही हैं बगावत

दिल्ली।(ब्यूरो) कांग्रेस में पांच पूर्व मुख्यमंत्रियों, कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों, मौजूदा सांसदों और पूर्व केंद्रीय मंत्रियों समेत 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा है। चिट्ठी का कहना है कि पार्टी में हर स्तर पर बदलाव की आवश्यकता है। यह भी स्वीकार किया है कि देश के युवा नरेंद्र मोदी के साथ लामबंद हो रहे हैं। साथ ही साथ, पार्टी का सपोर्ट बेस भी कम होता जा रहा है। पार्टी पर युवाओं का कम होता भरोसा गंभीर चिंता का विषय है।

वैसे तो इन वरिष्ठ नेताओं का पत्र सुझावों और सिफारिशों से भरा पड़ा है, लेकिन सोनिया गांधी से जुड़े कुछ नेता इसे बगावत से कम नहीं समझ रहे। तभी तो राहुल गांधी ने कथित तौर पर पत्र लिखने वालों की तुलना भाजपाइयों से कर दी। यह अपनी तरह की पहली बगावत है जब कोई गांधी पार्टी का नेतृत्व कर रहा है और बाकी नेता साथ नहीं दे रहे। अब तक इसका उल्टा ही होता आया है।

क्या पहली बार कांग्रेस में कलह हो रही है?
नहीं। ऐसा नहीं है। कांग्रेस में कलह, विरोध और टूट-फूट होती रही है। लेकिन इस बार पार्टी 6 साल से केंद्र की सत्ता से बाहर है। इससे पहले कांग्रेस 1996 से 2004 तक सत्ता से बाहर रही थी।

इससे पहले कभी भी पार्टी केंद्र की राजनीति से इतने समय तक बाहर नहीं रही है। फिर चाहे 1989 से 1991 की अवधि हो या 1977 से 1980 तक की अवधि। 1999 में बनी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार देश की ऐसी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी जिसने पांच साल पूरे किए।

बात 1969 की हो या 1977 की, इंदिरा गांधी ने पार्टी में बगावत की थी। 1969 में इंदिरा ने राष्ट्रपति पद के निर्दलीय उम्मीदवार वीवी गिरी को जिताने के लिए पार्टी के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हरवाया था। तब इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाला गया था।

1977 में भी जब इमरजेंसी के बाद पार्टी हारी तब के ब्रह्मानंद रेड्डी और वायबी चव्हाण ने इंदिरा के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया था। तब भी पार्टी टूटी और वजह इंदिरा ही बनी थी।

1987 में राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री और बाद में रक्षा मंत्री रहे वीपी सिंह ने ही बगावत की झंडाबरदारी की। जन मोर्चा बनाया और अन्य पार्टियों के साथ मिलकर 1989 में सरकार भी बनाई थी।

1990 के दशक में एनडी तिवारी और अर्जुन सिंह ने बगावत की थी, लेकिन तब उनके निशाने पर प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव थे। उन्होंने अलग पार्टी बना ली थी।
क्या पार्टी में पहली बार सोनिया गांधी को चुनौती मिली है?

इसे चुनौती कहना गलत होगा। लेकिन यह भी सच है कि सोनिया गांधी को इससे पहले भी पार्टी में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। पहली बार, उस समय जब उन्होंने 1997 में पार्टी के ही कुछ नेताओं के कहने पर कांग्रेस की सदस्यता ली।

सीताराम केसरी पार्टी अध्यक्ष थे। 1997 में माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, ममता बनर्जी, जीके मूपनार, पी. चिदंबरम और जयंती नटराजन जैसे वरिष्ठ नेताओं ने केसरी के खिलाफ विद्रोह किया था।

पार्टी कई गुटों में बंट गई थी। कहा जाने लगा था कि कोई गांधी परिवार का सदस्य ही इसे एकजुट रख सकता है। इसके लिए 1998 में सीताराम केसरी को उठाकर बाहर फेंका और फिर सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया गया।

शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने विदेशी मूल की सोनिया को अध्यक्ष बनाए जाने का विरोध किया तो पार्टी से उन्हें निकाल दिया गया। तीनों नेताओं ने राष्ट्रवादी कांग्रेस बनाई वर्ष 2000 में जब कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव हुए तो यूपी के दिग्गज नेता जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया को चुनौती दी। उन्हें गद्दार तक कहा गया। लेकिन उन्हें 12,000 में से एक हजार वोट भी नहीं मिल सके। इस तरह सोनिया का पार्टी पर एकछत्र राज हो गया।

सोनिया 1998 से 2017 तक लगातार 19 साल पार्टी की अध्यक्ष रहीं। यह पार्टी के इतिहास में अब तक का रिकॉर्ड है। 2019 में राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से ही अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर सोिनया के पास ही पार्टी की जिम्मेदारी है।

क्या गांधी परिवार के बाहर कोई बन सकता है पार्टी अध्यक्ष?

बन सकता है। लेकिन संभावना कम ही है। आजादी के बाद से पार्टी में 18 अध्यक्ष रहे हैं। आजादी के बाद इन 73 सालों में से 38 साल नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य ही पार्टी का अध्यक्ष रहा है। जबकि, गैर-गांधी अध्यक्ष के कार्यकाल में ज्यादातर समय गांधी परिवार का सदस्य प्रधानमंत्री रहा है।
यह तो तय है कि कांग्रेस चकित नहीं करने वाली। अंतरिम अध्यक्ष पद पर सोनिया गांधी को बने रहने की अपील के साथ ही यह स्पष्ट संदेश दे दिया गया है कि अगला अध्यक्ष राहुल गांधी या प्रियंका गांधी में से ही कोई होगा।

यदि गांधी परिवार के बाहर जाकर अध्यक्ष तलाशने की कोशिश की भी गई तो वह ज्यादा दिन तक टिक नहीं सकेगा, यह पार्टी का हालिया इतिहास बताता है। आजादी के बाद से गांधी परिवार के संरक्षण के बिना कोई अध्यक्ष टिक नहीं सका है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस यानी आईएनसी के संविधान में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि अध्यक्ष का चुनाव कैसे किया जाए। वैसे, भाजपा की ही तरह यहां भी कोशिश होती है कि सर्वसम्मति बन जाए और चुनाव की नौबत न आए। ऐसे समय में जब पार्टी में कलह मची हुई है, तब कांग्रेस में अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया को जानना महत्वपूर्ण हो गया है। नॉलेज बढ़ाने वाली यह जानकारी आप अपने दोस्तों, सहकर्मियों के साथ शेयर कर सकते हैं.

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