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सत्संग की महिमा

एक बार देवर्षि नारद जी भगवान विष्णु के पास गये और प्रणाम करते हुए बोलेः “हे लक्ष्मीपते, हे कमलनयन, कृपा करके इस दास को सत्संगकी महिमा सुनाइये”

✍️भगवानने मंद मंद मुस्कराते हुए अपनी मधुर वाणी में कहाः हे नारद, सत्संग की महिमा का वर्णन करने में तो वाणी की गति नहीं है..l
”फिर क्षण भर रूककर श्री भगवान बोलेः ” हाँ, यहाँ से तुम आगे जाओ। वहाँ इमली के पेड़ पर एक बड़ा विचित्र, रंगीन गिरगिट है, ?वह सत्संग की महिमा जानता है, उसीसे पूछ लो”

✍️देवर्षि खुशी-खुशी इमली के पेड़ के पास गये और योगविद्या के बल से गिरगिट से बातें करने लगे।उन्होंने गिरगिट से पूछाः “सत्संग की महिमा क्या है?कृपया मुझे बतलाइये।”

✍️सवाल सुनते ही वह गिरगिट पेड़ से नीचे गिर गया और छटपटाते हुए प्राण छोड़ दिये। नारदजी को बड़ा अचंभा हुआ। वे डरकर लौट आये और भगवान को सारा वृत्तान्त कह सुनाया।
✍️भगवान ने मुस्कराते हुए कहाः “अच्छा,नगर के उस धनवान के घर जाओ और वहाँ जो तोता पिंजरे में दिखेगा,उसी से सत्संग की महिमा पूछ लेना।”
✍️नारदजी क्षण भर में वहाँ पहुँच गये एवं तोते से वही सवाल पूछा, मगर देवर्षि के देखते ही देखते उसने आँखें मूंद लीं और उसके भी प्राण पंखेरू उड़ गये।अब तो नारद जी बड़े घबरा गये।
✍️वे तुरंत भगवान के पास लौट आये व कहने लगेः प्रभु, “यह क्या लीला है,! क्या सत्संग का नाम सुनकर मरना ही सत्संग की महिमा है ?”
✍️श्री भगवान हँसकर बोले “वत्स ! इसका मर्म भी तुमको समझमें आ जायेगा। इस बार नगर के राजाके महलमें जाओ और उसके नवजात पुत्र से अपना प्रश्न पूछो।”
✍️नारदजी तो थरथर काँपने लगे और बोलेः “हे प्रभु !अब तक तो बच गया लेकिन अब की बार तो लगता है मुझे ही मरना पड़ेगा। अगर वह नवजात राजपुत्र मर गया तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा।”
✍️भगवान ने नारदजी को अभयदान दिया।नारदजी दिल मुट्ठी में रखकर राजमहल में आये।वहाँ उनका बड़ा सत्कार किया गया।अब तक राजा को कोई संतान नहीं थी।अतः पुत्र के जन्मपर बड़े आनन्दोल्लास से उत्सव मनाया जा रहा था।
✍️नारदजी ने डरते-डरते राजा से पुत्र के बारेमें पूछा।नारदजीको राजपुत्र के पास ले जाया गया। पसीने से तर होते हुए, मन-ही-मन श्रीहरि का नाम लेते हुए नारदजी ने राज पुत्र से सत्संग की महिमा के बारे में प्रश्न किया तो वह नव जात शिशु हँस पड़ा और बोलाः “महाराज ! चंदन को अपनी सुगंध और अमृत को अपने माधुर्य का पता नहीं होता।ऐसे ही आप अपनी महिमा नहीं जानते इसलिए मुझ से पूछ रहे हैं।
✍️वास्तव में आप ही के क्षणमात्र के संग से, मैं गिरगिट की योनि से मुक्त हो गया और आप ही के दर्शनमात्र से तोते की क्षुद्र योनि से मुक्त होकर इस मनुष्य जन्म को पा सका।
✍️आपके सान्निध्य मात्र से मेरी कितनीसारी योनियाँ कट गयीं और मैं सीधे मानव-तन में पहुँच गया, राजपुत्र बना। यह सत्संग का कितना अदभुत प्रभाव है….! हे ऋषिवर, अब मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य,भगवद् प्राप्ति को पा लूँ।”
✍️नारदजीने खुशी-खुशी आशीर्वाद दिया और फिर भगवान श्री हरि के पास जाकर सब कुछ बताया। श्रीहरि बोलेः “सचमुच, सत्संग की बड़ी महिमा है। संत का सही गौरव या तो संत जानते हैं या उन के सच्चे प्रेमी भक्त…. !”
✍️इसलिए जब भी समय मिले, अपने दैनिक जिवन कार्यप्रणाली में से समय चुराकर भी,अपना जीवन सफल कराने वाला,परम कल्याण कारक भगवत् प्राप्ति की और ले जाने वाला सत्संग, वैष्णवजनो से अवष्य ही करना चाहिये।

:  जगद्गुरु पंचानंद गिरि जी महाराज

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