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न तैयारी, न इंतजाम, किसान को छोड़ा भगवान भरोसे -रणदीप सुरजेवाला

कैथल ।

हरियाणा की भाजपा-जजपा सरकार किसानों के साथ घोर अन्याय व सौतेला व्यवहार कर रही है। कांग्रेस की ओर से बार-बार ध्यान दिलाए जाने के बावजूद सरकार ने सही समय पर फसल खरीद की कार्यवाही शुरू नहीं की। लगता है कि सरकार ने पूरी ताकत सरसों-गेहूँ खरीद की बजाए शराब फैक्ट्रियां चलवाने में लगा रखी है।
इसका सबूत आज सामने आ गया, जब हरियाणा सरकार ने सरसों की ख़रीद शुरू होने से 24 घंटे पहले प्रदेश में ख़रीद केन्द्रों की संख्या को अचानक 192 से घटाकर 163 कर दिया। सभी जानते हैं कि सरसों महेंद्रगढ़, दादरी, भिवानी, रेवाड़ी, गुरुग्राम, मेवात, हिसार, सिरसा जैसे इलाकों की एक प्रमुख फसल है, लेकिन सरकार ने रातों रात फैसला बदलते हुए महेंद्रगढ़ के खरीद केंद्रों की संख्या को 34 से घटाकर 18 कर दिया है। इसी प्रकार भिवानी में 32 से 22, हिसार में 23 से 17, गुरुग्राम में 4 से 3, सिरसा में 26 से 23 और दादरी में 17 से घटाकर 16 कर दिए। यह सरकार की नाकामी व निकम्मेपन का जीता जागता उदाहरण है। यहां तक कि 4435 रु. क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य होने के बावजूद खरीद शुरू होने से पहले ही किसान की सरसों 3500-3800 रु. क्विंटल के औने-पौने दाम में बिक रही है।
किसान का दाना-दाना खरीदना प्रदेश व केंद्र सरकार का कर्तव्य है। पर खट्टर-चौटाला जी की जोड़ी किसान को तकनीकी कारणों और पहलुओं में उलझाकर परेशान कर रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि 95 प्रतिशत किसानों के पास वेबसाइट व इंटरनेट की सुविधा नहीं है, तो ऐसे में वे “मेरा खेत मेरा ब्योरा” वेबसाईट पर अपना ब्योरा कैसे भरते? सरकार पहले चाहती तो अपने सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों के माध्यम से गाँव वाइज यह ब्यौरा इकट्ठा करवाया जा सकता था या मंडी में खरीद के मौके पर यह काम किया जा सकता है।
अगर प्रदेश सरकार अन्य प्रदेशों के किसानों की फसलों को हरियाणा की मंडियों में आने से रोकना चाहती है तो उसे हरियाणा के किसानों को परेशान करने की बजाए अपनी प्रादेशिक सीमाओं पर उचित व्यवस्था करनी चाहिए। यदि लॉकडाऊन के दौरान भी सरकार प्रदेश की सीमाएं सील करने में विफल है, तो इससे बड़ा राजनैतिक व प्रशासनिक विफलता का सबूत और क्या हो सकता है?
प्रदेश सरकार ने प्रति एकड़ 8.33 क्विंटल सरसों की औसत के हिसाब से जिले की केवल 25 प्रतिशत सरसों ख़रीदने का फैसला किया है जो नाकाफी है और किसानों से नाइंसाफी है। यदि तकनीकी विकास के कारण कोई किसान अपने खेत में 10 से 12 क्विंटल सरसों तक पैदा करता है, तो ऐसे अच्छे और प्रगतिशील किसानों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, ना कि उन्हें अपनी फसल MSP से कम रेट पर बेचने के लिए बाध्य किया जाए।
श्री मनोहर लाल खट्टर व श्री दुष्यंत चौटाला प्रदेश के किसानों को जवाब दें:-
1. 11 अप्रैल, 2020 को हरियाणा सरकार के खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा जारी पत्र के अनुसार प्रदेश में 192 खरीद केंद्र थे, जिन्हें 13 अप्रैल, 2020 को घटाकर 163 कर दिया गया, जिससे बीस प्रतिशत किसानों के खरीद केंद्र रातों रात बदल गए (संलग्नक A1 और A2)। उन किसानों का क्या होगा, उन्हें अपने नए खरीद केंद्र का कब पता चलेगा और वे अपनी सरसों कब और कैसे बेच पाएंगे?
2. सरसों के खरीद केंद्र कम होने का कारण क्या है? क्या यह समय से तैयारी न करने के कारण हुआ है या अधिकारियों व विभागों में तालमेल व सामंजस्य की कमी का नतीजा है? क्या इसका मतलब यह है कि गेहूँ की खरीद शुरू होने से पहले ही सरकार की तैयारियों की पोल खुल गई है?
3. एक तरफ तो सरकार की ओर से आज अधिकृत रूप से सरसों की खरीद शुरू हो गई, लेकिन हमारी जानकारी के अनुसार निरस्त किए गए खरीद केंद्रों के किसानों को अभी तक यह नहीं बताया गया कि वे अब कब और कहां सरसों बेच पाएंगे? किसानों के पास खरीद से 24 घंटे पहले उनके मोबाइल से sms भेजने की बात कही गई थी। अब कब उनके sms आएंगे और किसान कौन से सेंटर पर अपनी फसल लेकर जाएंगे?
4. सभी आढ़तियों के पहले से ही बैंकों में खाते भी हैं और कैश-क्रेडिट लिमिट भी। 13 अप्रैल, 2020 को एक नया तुगलकी फरमान जारी करते हुए हरियाणा सरकार ने आढ़तियों को 7 प्राईवेट बैंकों में (समेत डूबते हुए यस बैंक) खाते खोलने का निर्देश जारी कर दिया। इसकी कॉपी संलग्नक A3 है। सवाल यह है कि आढ़ती कब नए खाते खुलवाएंगे, कब नई कैश-क्रेडिट लिमिट मंजूर करवाएंगे, कब उन खातों में सरकार भुगतान करेगी और कब किसान को भुगतान होगा? 7 प्राईवेट बैंकों पर यकायक यह मेहरबानी क्यों? डूबते हुए यस बैंक में आढ़तियों के खाते खुलवाने और पैसा जमा करवाने के लिए क्यों बाध्य किया जा रहा है?
5. यदि सरसों की खरीद में ही यह हाल है तो गेहूँ की खरीद कैसे सुनिश्चित होगी? 26 मार्च, 2020 को खट्टर सरकार ने किसान-मजदूर-आढ़ती को गेहूं पर 125 रु. क्विंटल बोनस देने का एक झुनझुना थमा दिया। पर बीस दिन बीत जाने के बाद अब गेहूं पर दिए जाने वाले बोनस की इस मांग पर खट्टर सरकार रहस्यमयी चुप्पी साधे है। हमारा सवाल है कि सरकार स्पष्ट करे कि किसान को बोनस दिया जाएगा या नहीं और दिया जाएगा तो कब?

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