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चाय, पकोड़े से राष्ट्र वाद तक वाया इंदिरा इमरजेंसी 

2014 लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर की चायवाला टिप्पणी को श्री नरेंद्र मोदी जो मंच पर वाक्पटुता के जादूगर कहे जा सकते हैं को लपक कर ब्रम्हास्त्र बना डाला। सारा देश क्षमा कीजिये देश की हिंदी पट्टी चाय की खुमारी में बह निकली और नरेंद्र भाई मोदी अच्छे दिन 15 लाख के घोड़े पर सवार होकर चाय वाला ब्रह्मास्त्र लहराते हुए चुनावी अश्वमेघ यात्रा पर निकल पड़े और अन्ना आन्दोलन द्वारा खड़े किये गए भ्रस्टाचार रूपी राक्षस उर्फ़ कांग्रेस से देश को मुक्त करने के अभियान में जुट गए।
  • मोदी जी के नाटकीय अंदाज से सम्मोहित हो सारा देश चाय पर चर्चा करने लगा। नुक्कड़ के चाय वाले से लेकर रेलवे पर चाय स्टॉल ही नहीं भाजपा संघी कार्यकर्ताओं में पूरी हिंदी पट्टी को प्रायोजित चाय स्टॉलों के माध्यम से लोकसभा चुनाव को चाय बनाम काल्पनिक भ्रष्टाचार के प्लेटफार्म पर ला खड़ा किया। काल्पनिक भ्रस्टाचार क्यों ? क्योंकि चार साल में 2 जी के सभी आरोपी जो मनमोहन सरकार में सींखचो के पीछे जा चुके थे बाइज्जत बरी हो चुके हैं। कोयला घोटाले में कुछ कठपुतली अफसरों को छोड़ किसी नेता या व्यापारिक संस्थान जिनके नाम उछाले थे बरी हो गए। कॉमनवेल्थ घोटाले को तो पाताल खा गया लगता है।
  • चाय के प्याले पर अच्छे दिन, 15 लाख, एक करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष के बिस्कुट चबाए जाने लगे। काला धन वापसी के चॉकलेटी केक को काट-काट कर देश का हर चायवाला गर्व से जगमगाने लगा तथा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर स्वयं को बैठा महसूस करने लगा। मतदाता ऐसा सम्मोहित हुआ कि भाजपा को अप्रत्याशित बहुमत दे बैठा तथा सौ साल पुरानी कांग्रेस 44 सीट पर लुढ़क गई। इस अप्रत्याशित जीत ने श्री नरेंद्र मोदी को बाहुबली फिल्म का नायक बना डाला।

जुमलों की राजनीति……

 

  • आप जानते ही हैं कि बाहुबली फिल्म किसी भी स्तर पर यानि कथा, संगीत, डायलॉग और एक्टिंग पर खरी न उतरकर भी बॉक्स ऑफिस पर सफलतम फिल्म बन बैठी। इस फिल्म और श्री नरेंद्र मोदी की विजय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय जनमानस को सुनहरी स्वप्न दिखलाकर सम्मोहित किया जा सकता है। श्री मोदी व भाजपा आरएसएस मशीनरी तथा कुकुरमुत्ते से उपजे मोदी भक्तों को अप्रत्याशित रूप से सक्रिय कर दिया। चार साल में अच्छे दिन, 15 लाख, काला धन वापसी और भ्रष्टाचार मुक्ति जुमले बन गए। जिसे दिल्ली चुनाव में अमित शाह ने भरी सभा में खुद कुबूल कर बैठे कि ये चुनावी जुमले थे। श्री गडकरी वायरल वीडियो टेप में कुछ ऐसा ही कहते नजर आए।
  • इसके बाद तो राजसी अंदाज में ताजपोशी तथा नाटकीय अंदाज में संसद की देहरी चूमने के बाद एक ओर लव जिहाद, घर वापसी, गौरक्षा, गीता महोत्सव, राष्ट्रप्रेम बनाम राष्ट्रद्रोही के जुमले बरसाती मेंढकों की तरह अवतरित हो गया। वहीं दूसरी तरफ नोटबंदी, जीएसटी, आधार कार्ड, खुले में शौच मुक्ति जैसे अभियान बिना किसी सोच-तैयारी के निरीह जनता पर थोप दिए गए।

नोटबंदी के समय पार्टी के लोग भी हो गए नाराज……..

 

  • श्री मोदी हर महीने मन की बात परोसने लगे, लेकिन जनता व जनता की भावना जनता की तकलीफों से दूर होते गए। वे विश्व भ्रमण पर निकल पड़े। जिन दिनों देश के गरीब बैंकों के आगे रात-दिन अपनी गाढ़ी कमाई के पुराने नोट बदलने हेतु लाइन में खड़े त्रस्त थे, मोदी जी जापान आदि देशों की यात्रा कर रहे थे। उनकी ग्लोब-ट्रोर्टर छवि से विपक्ष ही नहीं भाजपा व संघकार्यकर्ता भी आजिज आ गए। जिसका प्रमाण महाराष्ट्र के किसान नेता व संघ कार्यकर्ता किशोर तिवारी जिन्हें महाराष्ट्र में केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है का श्री मोहन भागवत का तथाकथित खत जिसमें उन्होंने लिखा है कि श्री नरेंद्र मोदी के पाँव जमीन पर टिकते ही नहीं हैं।
  • खैर अब आती है पकौड़े की बारी- जब सुरसा मुख सी बढ़ती बेरोजगारी पर सवाल उठाने शुरू हो गए और ये सवाल मोदी- मय हुए या मोदी भय से भयभीत मीडिया में भी सिर उठाने लगे तो प्रधानमंत्री मोदी ने देश के युवाओं को रोजगार के नाम पर पकौड़े बनाने का झुनझुना थमाने का प्रयास किया। शायद उन्हें भ्रम था कि जिस तरह चाय की चुस्की ने उनकी नैया 2014 में पार करवा दी थी, पकौड़े की पतवार 2019 में उन्हें जीत दिला देगी। मगर तीखे पकौड़ों ने चाय भी कड़वी बना डाली।

पांच राज्यों में हुये विधानसभा चुनाव से लगा झटका…..

  • गुजरात कर्नाटक के बाद  हुए पांच राज्यों के चुनावों में मोदी जुण्डली को आसमान से धरती पर ला पटका। इसका असर यह हुआ कि न केवल विपक्ष संगठित होने लगा है अपितु मोदी के साथी उसे छोड़ने लगे हैं। चंद्रबाबू नायडू, तेलंगाना के चंद्रशेखर, बिहार के कुशवाहा तो छोड़ ही गए, शिवसेना की नाराजगी जगजाहिर थी ही अब मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले रामबिलास पासवान भी कसमसाते दिखे । उनके सुपुत्र मीडिया में न केवल राहुल गांधी व तेजस्वी यादव की तारीफ कर रहे हैं अपितु मोदी द्वारा अनदेखी के आरोप सरेआम लगा रहे हैं। राफेल पर जेपीसी का समर्थन कर रहे हैं, नोटबंदी पर जवाब मांग रहे हैं। सुगबुगाहट तो भाजपा-आरएसएस में भी सुनी जा रही थी अब धीरे-धीरे मुखर होने लगी है ।
  • शिव सेना के मुखपत्र कहे जाने वाले समाचार पत्र सामना के दिसम्बर के अंक में त्रिशंकु लोक सभा की शंका प्रकाशित की गई है | साथ ही यह भी लिखा है कि अगले छ: महीने मोदी सरकार के लिए कठिन होते  जा रहे थे। संघ के भीतर-भीतर अपने देशभर में फैले कार्यकर्ताओं के माध्यम से जनता में फ़ैली मोदी विमुखता को समझकर 2019 से मोदी के स्थान पर गडकरी की बात फ़ैल रही है । वैसे राजनीति के जानकार यह भी जानते हैं कि 2014 में भी प्रधान मंत्री पद हेतु संघ की प्रथम च्वाइस श्री गडकरी ही थे ,इसीलिए लिपोसक्शन तकनीक से श्री गडकरी का वजन 28 किलो वजन कम करवाया गया था। अगर विरोधियों ने उनकी फर्जी कम्पनियों को उजागर नहीं किया होता तो उन्हें भाजपा अध्यक्ष सेत्यागपत्र देना पड़ता और वे निसंदेह भाजपा का चेहरा होते।

क्या इतिहास दोहराया जायेगा……

  • साफ तौर पर मीठी चाय का जादू हवा- हवाई हो चुका है और पकौड़े तीखे होकर राजनेताओं व् जनता के गले नहीं उतर रहे थे  उलटे मोदी-शाह के गले में फांस बनते जा रहे थे । ऐसे में पुलवामा और उसके बाद हुई एयर स्ट्राइक व पायलट  अभिनद्न की वापसी ने एक ओर मोदी शाह के साथ साथ मोदी भक्तों में संजीवनी फूंकने का काम किया। वहीँ विपक्ष को लाम बंद होने को मजबूर कर दिया। हालांकि विपक्ष उस तरह मजबूत अब भी नहीं है जैसा इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी के समय हुआ था। तब धुर दक्षिण पंथी जनसंघ ने इंदिरा से निबटने के लिए अपना वजूद भीजनता पार्टी में विलय कर ख़त्म कर दिया था। अगर ऐसा होता तो मोदी की हार इंदिरा की तरह हो सकती थी। लेकिन अब तो सब कुछ 23 मई को ही पता लगेगा |
          डॉ. श्याम सखा श्याम

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